Mumbai Saga Review: जॉन की फिल्म में इमरान का कमाल, संजय गुप्ता ने खुद बजाई अपने लिए खतरे की घंटी

Movie Review: मुंबई सागा
कलाकार: जॉन अब्राहम, इमरान हाशमी, सुनील शेट्टी, महेश मांजरेकर, प्रतीक बब्बर, काजल अग्रवाल, अंजना सुखानी और इमरान हाशमी आदि
लेखक: संजय गुप्ता, वैभव विशाल
निर्देशक: संजय गुप्ता
निर्माता: भूषण कुमार, कृष्ण कुमार, अनुराधा गुप्ता और संगीता अहीर
रेटिंग: **

जॉन अब्राहम एक स्मार्ट से डैनियल क्रेग, लियाम नीसन या निकोलस केज जैसे छरहरे, भावुक और चुस्त तदुरुस्त अभिनेता बन सकते हैं। लेकिन, उनको शायद हल्क बनना है। हल्क मार्वेल सीरीज का स्पेशल इफेक्ट्स से पैदा किया गया प्राणी है। हीरो के खून के भीतर होने वाले केमिकल लोचे से बनने वाला सुपरमैन। जॉन अपने आप में मैन ही काफी हैं, क्यों वह परदे पर नथुने फुलाकर, नसें तानकर और मांसपेशियां चौड़ी करके हल्क बनना चाहते हैं, वही जाने। लेकिन, ऐसा करने से उनका बड़ी मुश्किल से बना फैनबैस उनसे छिटकने लगा है। ‘मुंबई सागा’ में उन्हें इसकी बानगी मिलेगी और जल्द ही वह नहीं संभले तो तीसरी ‘सत्यमेव जयते’ शायद ही बने।

मुंबई सागा

निर्देशक संजय गुप्ता की फिल्म ‘मुंबई सागा’ उनकी टिपिकल मसाला फिल्म मेकिंग का वह डैंजरस प्वाइंट है, जहां से उनकी रफ्तार एस्केप वेलॉसिटी पकड़ने वाली है यानी वह और तेज भागे तो फिर लौटने का रास्ता बंद मिल सकता है। इस फिल्म की कहानी वहीं से शुरू होती है, जिसके बाद बंबई में अंडरवर्ल्ड ने संगठित तरीके से काम करना शुरू किया। मुट्ठी भर लोग। आपस में यूं एक दूसरे से बंधे हुए कि उनके हाथ के नीचे काम करने वाले सैकड़ों हजारों लोगों को पता ही नहीं कि वे काम कर किसके लिए रहे हैं। बदमाश, पुलिस, कारोबारी का भेद खत्म होना यहीं से शुरू होता है। पता ही नहीं चलता कि खाकी पहनने वाला बड़ा बदमाश है या बदमाशी करने वाल ज्यादा वफादार। और, इन दोनों के बीच कुछ ऐसे भी हैं जो सिर्फ तमाशा देखते हैं। अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कुछ भी करते हैं और लगा देते हैं पूरे एक शहर को दांव पर।  

मुंबई सागा

फिल्म ‘मुंबई सागा’ उस खांचे का सिनेमा है जिसमें कभी धर्मेंद्र की ‘जलजला’, ‘हुकूमत’, ‘लोहा’ जैसी फिल्में शामिल होती रही है। कहानी कुछ नहीं। बस फड़कती भुजाएं हैं, धड़कती टोलियां हैं और हैं हर तरफ से बरसती गोलियां। कानों में रुई लगाने की नौबत आ सकती है क्योंकि थिएटर वाले को बताना है कि उसका साउंड सिस्टम दुनिया का बेस्ट है और फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक बनाने वालों को डायरेक्शन मिला ही है धमाकेदार म्यूजिक बनाने का। इस चक्कर में गाने तो बहुत ही खराब बने हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भी शोर से ज्यादा कुछ नहीं बन पाया है।

सुनील शेट्टी

पहले हल्ला मचा था कि संजय गुप्ता की फिल्म ‘मुंबई सागा’ सीधे ओटीटी पर रिलीज होगी फिर फिल्म सिनेमाघरों तक आ पहुंची। यहां न रिमोट आपके हाथ में है और न ही वॉल्यूम पर कोई कंट्रोल। जो है सो झेलना ही है। आखिर तक फिल्म देख सकने की अगर आप में कूवत है। हां, फिल्म पूरी देखने के दो फायदे हैं। एक तो सुनील शेट्टी को देख ये लगता है कि इस कलाकार में अब भी बहुत जान बाकी है और दूसरा ये कि अगर महेश मांजरेकर को ‘1962: द वॉर इन द हिल्स’ जैसी सीरीज ही निर्देशित करनी हैं तो उन्हें निर्देशन छोड़ एक्टिंग पर फोकस करना चाहिए। ये काम वह बहुत बढ़िया कर लेते हैं।

जॉन अब्राहम, इमरान हाशमी

फिल्म में दो हीरोइनें भी हैं, ये दर्शक को याद रखना होता है। क्योंकि न काजल अग्रवाल फिल्म खत्म होने के बाद दर्शक को याद रहती हैं और न ही अंजना सुखानी। बस, फिल्म ‘मुंबई सागा’ का कुछ याद रह जाता है तो वह है इमरान हाशमी का काम। अच्छा हुआ कि इमरान ने हीरो बने रहने का मोह त्याग दिया है। इस तरह की भूमिकाओं में वह कमाल हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि सलमान के साथ फिल्म ‘टाइगर 3’ में उनका असली जमाल भी देखने को मिलेगा।

Source – Amarujala

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