BJP Foundation Day: सिर्फ 3 वोट के बहुमत और पार्टी से निकाल दिए गए थे अटल-आडवाणी, दो दिन बाद बनी बीजेपी

BJP Foundation Day 2021: भारतीय जनता पार्टी अपने वर्तमान रूप में 6 अप्रैल, 1980 को अस्तित्‍व में आई। साल 1984 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ दो सीट जीतने वाली भाजपा आज अपने दम पर बहुमत लेकर केंद्र में सत्‍तारूढ़ है।

भारतीय जनता पार्टी आज अपना 41वां स्‍थापना दिवस मना रही है। 6 अप्रैल, 1980 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्‍यक्षता में जनसंघ से निकले लोगों ने बीजेपी बनाई। वाजपेयी और लंबे अरसे तक उनकी परछाई रहे पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्‍ण आडवाणी ने मिलकर पार्टी को 1984 में दो सीट से 1998 में 182 सीटों तक ला खड़ा किया था।

हिंदुत्‍व और राम जन्‍मभूमि के एजेंडे पर आगे बढ़ी बीजेपी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत का स्‍वाद चखा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में। 2014 में बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं तो 2019 में उसकी सीटों का आंकड़ा 300 के पार चला गया।

आडवाणी ने अपनी आत्‍मकथा ‘मेरा देश, मेरा जीवन’ (प्रभात प्रकाशन) में बीजेपी के अस्तित्‍व में आने पर एक पूरा चैप्‍टर लिखा है। ‘कमल का खिलना, भारतीय जनता पार्टी का जन्‍म’ चैप्‍टर में आडवाणी बताते हैं कि किस तरह जनसंघ के टुकड़े हुए और बीजेपी बनी।

‘भारतीय मतदाता के मन को भांप पाना आसान नहीं’

अपनी किताब में आडवाणी लिखते हैं, “एक विषय जिसने पूरे राजनीतिक जीवन में मुझे चकित किया है, वह है भारतीय मतदाता चुनावों में अपनी पसंद का निर्धारण कैसे करते हैं ? कई बार उनके रुझान का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन ज्यादातर नहीं। भारतीय मतदाताओं के विशाल विविधता के चलते सामान्यत: चुनाव के परिणामों का पूर्वानुमान लगाना असंभव होता है। हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि मतदाताओं का सामूहिक व्यवहार किसी एक भावना संचालित होता दिखता है और इससे उनकी पसंद का अनुमान लगाया जा सकता है। औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त न करने के बावजूद एक अनुभवी राजनीतिक कार्यकर्ता अक्सर यह भविष्यवाणी कर सकता है कि चुनावी हवा किस ओर बह रही है।”

मुझे 1980 के चुनाव में इसका आभास हो गया था

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आडवाणी लिखते हैं, “मैंने ऐसा वर्ष 1977 के आम चुनावों से पहले किया था, जो आपातकाल के बाद हुए थे। और मैंने पुन: ऐसा ही 1980 के आरंभ में किया, जब छठी लोकसभा भंग होने के बाद मध्यावधि चुनाव हुए थे। मैं जानता था कि राजनीतिक पार्टी का सफाया हो जाएगा और इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में लौटेंगी। इसका कारण साफ था। यदि आपातकाल के विरुद्ध रोष की भावना ने 1977 में जनता पार्टी को सत्ता दिलाई तो एक अन्य सामूहिक आपसी झगड़ों के कारण जनता पार्टी की सरकार गिरने से उत्पन्न हुई निराशा ने लोगों के भ्रम को तोड़ दिया और इस बार यह मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करने वाला था।”

हार का दोष जनसंघ से जुड़े लोगों पर मढ़ दिया गया

पूर्व डेप्‍युटी पीएम ने अपनी आत्‍मकक्षा में आगे लिखा है, “जनता पार्टी की भारी पराजय ने मुझे मतदाताओं के व्यवहार के एक अन्य पहलू के बारे में भी परिचित करवाया। जब मतदाता एक पथभ्रष्ट राजनीतिक दल को सबक सिखाना चाहते हैं तो अक्सर उस दल के विरुद्ध आक्रोश के कारण। 1980 में हमने यह भी सीखा कि गहरा भोहभंग भी हमें उस पार्टी को सजा देने के लिए उकसा सकता है, जो सकी आशाओं पर खरा नहीं उतरती।

….. चुनावी पराजय ने जनता पार्टी के भीतर दोहरी सदस्यता के विवाद को और गहरा दिया था, जो संसदीय चुनावों तक प्रभावी रहा। 25 फरवरी, 1980 को जगजीवन राम ने पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर को एक पत्र लिखकर इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की। हार के पूरा दोष उन लोगों पर मढ़ने की कोशिश की गई, जो जनसंघ से जुड़े हुए थे और इस बात पर अडिग थे कि वे संघ से अपने संबंध नहीं तोड़ेंगे।”

और 3 वोटों से हमें पार्टी से निकाल दिया गया

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आडवाणी उन परिस्थितियों के बारे में बताते हैं जिनसे बीजेपी का जन्‍म हुआ। वे लिखते हैं, “जनता पार्टी के भीतर संघ विरोधी अभियान ने 1980 के लोकसभा चुनावों में कार्यकर्ताओं के उत्साह को ठंडा कर दिया था। इससे स्पष्ट रूप से कांग्रेस को लाभ हुआ और चुनावों में इसने जनता पार्टी के प्रदर्शन को गिराने का प्रयास किया। 4 अप्रैल को जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की एक अहम बैठक नई दिल्ली में निश्चित की गई, जिसमें दोहरी सदस्यता के बारे में आखिरी फैसला लिया जाना था। मोरारजी देसाई और कुछ अन्य सदस्यों ने हमें पारस्परिक समझौते की स्वीकार्यता के आधार पर जनता पार्टी में बनाए रखने का अंतिम प्रयास किया। परंतु भविष्य लिखा जा चुका था। जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने समझौते फॉर्मूले को 14 की तुलना में 17 वोटों से अस्वीकार कर दिया और प्रस्ताव पारित किया गया कि पूर्व जनसंघ के सदस्यों को निष्काषित कर दिया जाए।”

‘एक दल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा’

आडवााणी कहते हैं, “विचित्र संयोग था कि अगले ही दिन जगजीवन राम जनता पार्टी को छोड़कर वाई वी चव्हाण के नेतृत्ववाली कांग्रेस (यू) पार्टी में शामिल हो गए। चरण सिंह ने पहले ही पार्टी छोड़ दी थी। मूल जनता पार्टी में जो लोग बचे थे, वे बस अवशेष थे, जिसकी अध्यक्षता चंद्रशेखर कर रहे थे। कई आलोचक पार्टी का मजाक उड़ाने लगे। एक फिल्म गाने, ‘इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा’ में उन्होंने दिल शब्द को दल से बदलकर व्यंग्यात्मक रूप में कहा, ‘एक दल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा।'”

फिरोजशाह कोटला में बीजेपी का जन्म

आडवाणी के अनुसार, ‘दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में 5-6 अप्रैल, 1980 के दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में 3, 500 से अधिक प्रतिनिधि एकत्र हुए और 6 अप्रैल को एक नए राजनीतिक दल दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के गठन की घोषणा की गई। अटल बिहारी वाजपेयी को इसका पहला अध्यक्ष चुना गया। मुझे सिकंदर बख्त और सूरजभान के साथ महासचिव की जिम्मेदारी दी गई। यह कयास लगाए जाने लगे कि क्या नई पार्टी जनसंघ को पुनरुज्जीवित करेगी? अटल जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में स्पष्ट रूप से इस कयास को नकार दिया। उन्होंने कहा, नहीं हम वापस नहीं जाएंगे।’

‘अटलजी का दिया नाम भारतीय जनता पार्टी हर किसी को पसंद आया’

आडवाणी अपनी किताब में लिखते हैं, “आरंभ से ही हमारा जोर जनसंघ पर वापस लौटने पर नहीं था, बल्कि एक नहीं शुरुआत करने का था। यह पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा नई पार्टी के नाम पर हुए गहन विचार-विमर्श से भी स्पष्ट होता है। कुछ लोगों को लगता था कि इसको भारतीय जनसंघ कहना चाहिए। पर भारी बहुमत ने अटलजी द्वारा दिए गए नाम भारतीय जनता पार्टी का समर्थन किया, जो कि हमारे भारतीय जनसंघ और जनता पार्टी, दोनों को गौरवपूर्ण संबंधों को दर्शाता था और यह स्पष्ट करता था कि हम नई पहचान के साथ एक नहीं पार्टी हैं।”

अटल-आडवाणी ने बीजेपी को दी नई पहचान

बीजेपी के पहले अध्‍यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे। एक वक्‍त बीजेपी गांधी के आदर्शों पर चलने की बात करते हुए राजनीति करती थी। 1984 के लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटें जीतने के बाद, पार्टी हिंदुत्‍व की तरफ आकर्षित हुई। राम जन्‍मभूमि को एजेंडा बनाकर वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी ने बीजेपी को मुख्‍यधारा की राजनीति में ला दिया। 1989 में बीजेपी ने 85 लोकसभा सीटें जीतीं, फिर 1991 में 120 सीटों पर कब्‍जा जमा लिया। वाजपेयी के नेतृत्‍व में बीजेपी ने देश को पहली स्‍थायी गठबंधन की सरकार दी। 2004 में बीजेपी के चुनाव हारने के बाद पार्टी में अगले दौर के नेताओं की खोज शुरू हो गई।

मोदी और शाह ने बीजेपी को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया

2009 के लोकसभा चुनाव में भी जब बीजेपी वापसी नहीं कर सकी तो तब गुजरात के मुख्‍यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को जिम्‍मा सौंपा गया। 2014 का लोकसभा चुनाव बीजेपी ने मोदी के चेहरे को आगे कर लड़ा।

उन चुनावों में बीजेपी ने तबतक का सर्वश्रेष्‍ठ प्रदर्शन किया और पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आ गई। पार्टी को 282 सीटें हासिल हुई थीं। अगले लोकसभा चुनावों ने बीजेपी की टैली को और मजबूत होते हुए ही देखा। 2019 में बीजेपी ने 303 सीटें जीतीं और मोदी फिर प्रधानमंत्री बने।

अमित शाह जब भाजपा अध्‍यक्ष थे तो उन्‍होंने बीजेपी को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए अभियान शुरू किया। आज वह 18 करोड़ सदस्‍य होने का दावा करती है।

राम मंदिर, धारा 370 पर वादा पूरा किया

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बीजेपी मूल रूप से दक्षिणपंथी है। अयोध्‍या में राम मंदिर और जम्‍मू कश्‍मीर के विशेष दर्ज को खत्‍म करने का वादा पार्टी पूरा कर चुकी है। राष्‍ट्रीय नागरिक रजिस्‍टर, नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दों पर काम जारी है। इसके अलावा यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात भी बीजेपी करती आई है। पार्टी का मुखपत्र ‘कमल संदेश’ है जो एक पाक्षिक पत्रिका है। हिंदू राष्ट्रवाद को लेकर आगे बढ़ने वाली बीजेपी का चुनाव चिन्‍ह ‘कमल’ है। कमल कैसे बीजेपी का चुनाव चिन्‍ह बना, इसकी भी दिलचस्‍प कहानी है।

Source – Navbharat Times

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