महामारी के दौर में पेटेंट और व्यापार गोपनीयता अटका रहे कोरोना वैक्सीन के राह में रोड़े

COVID-19 Vaccination Update

Indian Patent Act वर्तमान कोरोना महामारी ने हमें एक बड़ा सबक सिखाया है कि मानवता का अस्तित्व अर्थशास्त्र की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए पेटेंट और व्यापार गोपनीयता को लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा की तुलना में न्यून रखने का समय हैं।

डॉ. अश्विनी महाजन। Indian Patent Act व्यापार वार्ताओं के उरुग्वे दौर के दिनों से, मुख्य रूप से बड़े निगमों के स्वामित्व वाले बौद्धिक संपदा अधिकारों (आइपीआर) के संरक्षण के निहितार्थ पर एक बहस शुरू हो गई थी। वास्तव में यह संरक्षण दवाओं और अन्य उपचारों तक नागरिकों के अधिकारों के खिलाफ था। विकसित दुनिया, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोपीय समुदाय व जापान की दादागीरी के चलते व्यापार संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स) का समझौता विश्व व्यापार संगठन के अंतिम समझौते का हिस्सा बन गया। लेकिन उसके बाद भी जन संगठनों और दुनिया भर के नागरिकों की लड़ाई जारी रही। भारत सहित विकासशील देशों को दवा पेटेंट के लिए उत्पाद पेटेंट संरक्षण के रूप में बदलने के लिए 10 साल की अवधि दी गई थी।

भारत ने भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 में संशोधन किया और इसे एक जनवरी, 2005 से प्रभावी किया। यदि हम सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से इन संशोधनों के प्रविधानों को देखें, तो मूल संशोधन बहुत खतरनाक थे। बुद्धिजीवियों, जन संगठनों व चुनिंदा नेताओं के दबाव के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों को पेटेंट अधिनियम में शामिल किया जा सका।हालांकि भारतीय पेटेंट अधिनियम में भारत के घरेलू दवा उद्योग और सार्वजनिक स्वास्थ्य के हितों का ध्यान रखा गया, वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के संदर्भ में ‘ट्रिप्स’ आड़े आ रहा था। एक ऐतिहासिक संदर्भ को यहां इंगित करना जरूरी है। जब दक्षिण अफ्रीका सरकार ने भारत की एक कंपनी से एड्स मरीजों के लिए दवा खरीदने का निर्णय किया तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा दक्षिण अफ्रीक सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया था। जनाक्रोश के कारण बाद में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना मुकदमा वापस ले लिया। लगभग उसी समय, डब्ल्यूटीओ की मंत्रिस्तरीय बैठक दोहा में आयोजित की गई थी।

ऐसे में विकसित देशों ने विकासशील देशों की मांग के सामने घुटने टेक कर जन स्वास्थ्य हेतु दोहा घोषणा की स्वीकृति दी थी। दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन की बौद्धिक संपदा (ट्रिप्स) एवं जन स्वास्थ्य से संबंधित एक राजनीतिक घोषणा स्वीकृत की गई। इस घोषणा में विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों द्वारा ट्रिप्स समझौते में बौद्धिक संपदा अधिकारों खास तौर पर पेटेंट के कारण दवाओं की उपलब्धता के प्रति चिंताओं का निराकरण किया गया। इसमें आगे कहा गया, ‘हम इस बात की पुष्टि करते हैं कि डब्ल्यूटीओ सदस्यों के सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए और विशेष रूप से, सभी तक दवाओं की पहुंच को बढ़ावा देने के लिए सहायक तरीके से समझौते की व्याख्या और कार्यान्वयन किया जाना चाहिए।’

अनिवार्य लाइसेंस के बारे में यह कहा गया है, ‘प्रत्येक सदस्य को अनिवार्य लाइसेंस देने का अधिकार है और इस आधार पर यह प्रक्रिया भी निर्धारित करने की स्वतंत्रता है कि किस तरह से लाइसेंस दिए जाएं।’ इस घोषणा द्वारा सदस्य देशों को राष्ट्रीय आपातकाल या अत्यधिक तात्कालिकता की अन्य परिस्थितियों का निर्धारण करने के लिए अनुमति दी गई है, कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। वर्तमान से बड़ा राष्ट्रीय आपातकाल नहीं हो सकता। एक देश को कोविड के खिलाफ अपनी लड़ाई में विविध प्रकार के चिकित्सा उत्पादों की आवश्यकता है, इसलिए एक-दो उत्पादों पर अनिवार्य लाइसेंस नीति प्रदान करना इस महामारी के उपाय के तौर पर पर्याप्त नहीं है। इन परिस्थितियों में अक्टूबर भारत और दक्षिण अफ्रीका ने विश्व व्यापार संगठन को एक प्रतिवेदन देकर अंतरराष्ट्रीय समझौतों के कुछ प्रविधानों पर छूट मांगी, जो महामारी को रोकने के प्रयासों को गति देने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकारों को विनियमित करते हैं।

वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने महानिदेशक नोगजी ओकोंजो-इवेला द्वारा आयोजित एक हालिया कार्यक्रम में बोलते हुए पुन: ट्रिप्स प्रविधानों में छूट हेतु समर्थन मांगा। वर्तमान में इस प्रस्ताव को लगभग 100 डब्ल्यूटीओ सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त है, जिसे कुछ विकसित देश रोकने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि समझौते के कुछ प्रविधानों पर छूट के इस कदम से अधिकांश देशों, खासकर मध्यम और निम्न-आय वाले देशों को वैक्सीन और अन्य आवश्यक दवाओं तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी। हालांकि व्यापार कूटनीति स्तर पर सरकार के प्रयास सराहनीय हैं, इस समय उचित होगा कि भारत सरकार कोविड के खिलाफ लड़ाई में दवाओं और टीकों की पहुंच और उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए।

अधिक जेनेरिक कंपनियों को भारतीय पेटेंट अधिनियम के सरकारी उपयोग लाइसेंस (धारा 100) के तहत एक सीमित कीमत के साथ रेमडेसिविर का उत्पादन करने की अनुमति दी जाए। कोविड रोगियों की जान बचाने के लिए सभी आवश्यक दवाइयों के उत्पादन के लिए अनिवार्य लाइसेंस दिया जाए। कोवैक्सीन और कोविशिल्ड का उत्पादन बढ़ाने के लिए सभी संभावित निर्माताओं के लिए व्यापार रहस्य सहित टीकों के प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की सुविधा सुनिश्चित की जाए। कुछ कंपनियों के बजाय तकनीकी क्षमताओं के साथ अधिक फार्मा कंपनियों के लिए व्यापक रूप से वैक्सीन उत्पादन लाइसेंस दिए जाएं। स्पुतनिक वैक्सीन का स्थानीय उत्पादन शुरू करने के लिए नियामक मंजूरी प्रदान की जाए। उत्पादन लागत आधारित फार्मूले के आधार पर दवाओं और टीकों की कीमतों पर सीलिंग लगाई जाए। यह कुछ विकसित देशों द्वारा वैक्सीन एकाधिकार को तोड़ने और विश्व स्तर पर टीकों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा।

Source – jagran

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